“सत्य, साधना और साक्षात्कार” के पावन पथ पर अग्रसर आप सभी प्रिय पाठकों को मेरा सप्रेम नमस्कार।
आज अत्यंत हर्ष और संतोष का विषय है कि ‘भगवत प्राप्ति संदेश दर्शन’ का यह प्रथम पुष्प आपके हाथों में है। अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि आज के सूचना के इस अंबार में एक नई पत्रिका की आवश्यकता क्यों पड़ी? उत्तर सरल है—आज सूचनाएं तो बहुत हैं, लेकिन ‘बोध’ की कमी है। ज्ञान तो हर जगह उपलब्ध है, लेकिन ‘दृष्टि’ का अभाव है।
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ मनुष्य ने चंद्रमा पर कदम तो रख दिए हैं, लेकिन वह अपने मन की गहराइयों में उतरने से डरता है। हम ग्रहों की चाल से भयभीत हैं, भविष्य की चिंता में वर्तमान को खो रहे हैं और समस्याओं के समाधान के लिए केवल ‘भाग्य’ को कोस रहे हैं।
इसीलिए, इस पत्रिका का जन्म एक संकल्प के साथ हुआ है: “भाग्य नहीं, बल्कि सोच बदलेगी”।
ज्योतिष शास्त्र कोई डराने वाली विद्या नहीं है, बल्कि यह वह प्रकाश है जो हमें बताता है कि अंधेरे में रास्ता कहाँ है। कुंडली की रेखाएं हमारे पिछले कर्मों का लेखा-जोखा मात्र हैं, लेकिन वर्तमान के कर्म और एक सकारात्मक सोच उन रेखाओं को बदलने की सामर्थ्य रखती है। इस पत्रिका के माध्यम से हम आपको केवल भविष्यफल नहीं बताएंगे, बल्कि वह ‘विवेक’ देंगे जिससे आप अपने भविष्य का निर्माण स्वयं कर सकें।
इस अंक में हमने अध्यात्म की गहराई, ज्योतिष की वैज्ञानिकता, कानून की जागरूकता और महाभारत के जीवन प्रबंधन को समेटा है। हमारा प्रयास है कि जब आप इस पत्रिका के पन्नों को पलटें, तो आपको केवल शब्द न मिलें, बल्कि जीवन की उलझनों को सुलझाने की एक नई दिशा मिले।
अध्यात्म का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करना है। जब हमारी सोच सात्विक होती है, तो हमारे निर्णय सही होते हैं; और जब निर्णय सही होते हैं, तो भाग्य का सूर्य स्वतः ही उदय होने लगता है।
आइए, सत्य की इस खोज में हम सहयात्री बनें। अपनी जिज्ञासाओं को दबाएं नहीं, उन्हें दिशा दें। हमें विश्वास है कि यह पत्रिका आपके जीवन में वैचारिक क्रांति का आधार बनेगी।
आपकी मंगलकामनाओं के साथ,
— डॉ. गौरव सक्सेना (प्रधान संपादक)



