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आपसी सहमति से तलाक कैसे लें? पूरी प्रक्रिया, समय और कानूनी जानकारी

आपसी सहमति से तलाक

Table of Contents

प्रस्तावना: जब रिश्ता टूटे, तो कानून समझना जरूरी है

जीवन में कभी-कभी ऐसे हालात आ जाते हैं जब पति और पत्नी दोनों यह महसूस करते हैं कि अब साथ रहना संभव नहीं है। जब दोनों पक्ष बिना किसी झगड़े, बिना किसी दोषारोपण के, शांतिपूर्ण ढंग से अपना विवाह समाप्त करना चाहते हैं — तो इसे आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) कहते हैं।

भारत में तलाक को लेकर लोगों के मन में बहुत भ्रम है। कुछ लोग सोचते हैं कि तलाक लेना बहुत कठिन है, बहुत महंगा है, सालों लग जाते हैं। कुछ लोगों को पता ही नहीं कि आपसी सहमति से तलाक एक अलग, सरल और अपेक्षाकृत तेज़ प्रक्रिया है।

इस लेख में हम इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे:

  • आपसी सहमति से तलाक क्या होता है?
  • इसके लिए कौन-कौन सी कानूनी धाराएं लागू होती हैं?
  • पूरी प्रक्रिया कदम-दर-कदम कैसे होती है?
  • कितना समय लगता है?
  • कितना खर्च आता है?
  • बच्चे और संपत्ति का क्या होता है?

यह लेख पूरी तरह से भारतीय कानून पर आधारित है। यह कानूनी सलाह नहीं है — यह एक सूचनात्मक लेख है। अपनी specific situation के लिए हमेशा एक qualified advocate से परामर्श लें।


आपसी सहमति से तलाक क्या होता है? (What is Mutual Consent Divorce?)

जब पति और पत्नी दोनों मिलकर, बिना किसी विवाद के, अदालत में यह घोषणा करते हैं कि वे अपना विवाह समाप्त करना चाहते हैं — तो इसे Mutual Consent Divorce या आपसी सहमति से तलाक कहते हैं।

यह तलाक की सबसे सभ्य, सबसे कम विवादास्पद और सबसे कम समय लेने वाली प्रक्रिया है।

Contested Divorce बनाम Mutual Consent Divorce — फर्क क्या है?

पहलूContested Divorce (विवादित तलाक)Mutual Consent Divorce (आपसी सहमति)
शुरुआतएक पक्ष दूसरे पर आरोप लगाता हैदोनों मिलकर आवेदन करते हैं
समय3 से 10+ साल6 महीने से 1.5 साल
खर्चबहुत अधिकअपेक्षाकृत कम
तनावबहुत अधिककम
गोपनीयताकमअधिक
बच्चों पर असरगंभीर मानसिक आघातकम नुकसान

स्पष्ट है कि जब दोनों पक्ष तैयार हों, तो आपसी सहमति से तलाक सबसे बेहतर विकल्प है।


कौन-कौन से कानून लागू होते हैं?

भारत में तलाक का कानून धर्म के आधार पर अलग-अलग है। आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया भी इसी पर निर्भर करती है:

1. हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 — धारा 13B (Hindu Marriage Act, Section 13B)

यह धारा हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख विवाहों पर लागू होती है।

Section 13B की मुख्य शर्तें:

  • पति और पत्नी कम से कम 1 साल से अलग रह रहे हों
  • दोनों एक साथ नहीं रह पा रहे (cohabitation संभव नहीं)
  • दोनों ने आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने का निर्णय लिया हो

दो चरण होते हैं:

  • First Motion: दोनों मिलकर petition दाखिल करते हैं
  • Second Motion: 6 महीने बाद (cooldown period) दोनों पुष्टि करते हैं

2. विशेष विवाह अधिनियम, 1954 — धारा 28 (Special Marriage Act, Section 28)

यह धारा Inter-religion marriages और Court Marriage पर लागू होती है।

Section 28 की शर्तें:

  • कम से कम 1 साल की शादी हो चुकी हो
  • 1 साल से अलग रह रहे हों
  • दोनों की आपसी सहमति हो

3. मुस्लिम पर्सनल लॉ (Muslim Personal Law)

मुसलमानों में तलाक की प्रक्रिया अलग है। आपसी सहमति के मामले में Khula (पत्नी द्वारा) और Mubarat (दोनों की सहमति से) जैसी अवधारणाएं हैं। इसके लिए Muslim Personal Law के जानकार वकील से मार्गदर्शन लें।

4. ईसाई विवाह अधिनियम, 1869 (Indian Divorce Act)

ईसाइयों के लिए Section 10A के तहत आपसी सहमति से तलाक का प्रावधान है। यहाँ 2 साल का अलगाव जरूरी है।

5. पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936

पारसियों के लिए भी अलग प्रावधान हैं।

नोट: इस लेख में हम मुख्यतः Hindu Marriage Act, Section 13B पर focus करेंगे क्योंकि यह भारत में सबसे अधिक applicable है।


आपसी सहमति से तलाक के लिए जरूरी शर्तें (Eligibility Criteria)

Section 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए इन शर्तों का पूरा होना जरूरी है:

शर्त 1: विवाह की अवधि — कम से कम 1 साल

शादी को कम से कम 1 साल पूरा होना चाहिए। शादी के 1 साल के भीतर आपसी सहमति से भी तलाक की petition नहीं दे सकते। (कुछ special circumstances में Court इसमें छूट दे सकती है।)

शर्त 2: 1 साल से अलग रहना

पति और पत्नी कम से कम 1 साल से अलग रह रहे हों। इसका अर्थ यह है कि वे एक ही छत के नीचे husband-wife की तरह नहीं रह रहे।

महत्वपूर्ण: “अलग रहना” का अर्थ जरूरी नहीं कि अलग घर हो। एक ही घर में रहते हुए भी अगर पति-पत्नी के संबंध नहीं हैं तो कुछ Courts इसे मान लेती हैं। लेकिन अलग-अलग पते होना ज्यादा मजबूत proof है।

शर्त 3: आपसी सहमति

दोनों पक्षों की स्वतंत्र और वास्तविक सहमति होनी चाहिए। किसी पर दबाव, धमकी या बल नहीं होना चाहिए।

शर्त 4: तलाक की शर्तों पर सहमति

दोनों पक्षों को निम्न विषयों पर पहले से सहमति बनानी होगी:

  • गुजारा भत्ता / स्थायी भरण-पोषण (Alimony / Maintenance)
  • बच्चों की custody
  • संपत्ति का बंटवारा

आपसी सहमति से तलाक की पूरी प्रक्रिया — कदम-दर-कदम (Step-by-Step Process)

अब समझते हैं कि यह प्रक्रिया कैसे काम करती है:


📌 चरण 1: आपसी समझौता (Mutual Agreement)

सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम है — दोनों पक्षों के बीच सहमति

इसमें तय होता है:

  • क्या दोनों वाकई तलाक चाहते हैं?
  • गुजारा भत्ता कितना देना होगा? कितने समय के लिए?
  • बच्चे किसके साथ रहेंगे? दूसरे parent का मिलने का time क्या होगा?
  • घर, जमीन, savings, गहने — किसको क्या मिलेगा?
  • स्त्रीधन का क्या होगा?

इन सब बातों पर लिखित में सहमति बनाना बेहतर है। इसे Settlement Agreement कहते हैं।


📌 चरण 2: वकील से परामर्श और Petition तैयार करना

किसी अनुभवी Family Law Advocate से मिलें। वकील आपकी situation के अनुसार:

  • Mutual Consent Divorce Petition तैयार करेगा
  • Joint Petition (दोनों की तरफ से एक petition) draft करेगा
  • Settlement Agreement को legal document में convert करेगा

Petition में क्या होता है?

  • दोनों पक्षों का पूरा नाम, पता
  • विवाह की तारीख और स्थान
  • अलग रहने की तारीख
  • तलाक की शर्तें (alimony, custody, property)
  • यह घोषणा कि तलाक बिना दबाव के माँगा जा रहा है

📌 चरण 3: First Motion — पहला आवेदन (First Motion Petition)

दोनों पक्ष मिलकर Family Court या जहाँ शादी हुई थी या जहाँ last साथ रहे थे उस jurisdiction की अदालत में Joint Petition दाखिल करते हैं।

जमा करने वाले दस्तावेज़:

  • जॉइंट पिटीशन (Joint Petition)
  • विवाह प्रमाण पत्र (Marriage Certificate)
  • दोनों के Address Proof (Aadhaar, Passport आदि)
  • दोनों की फोटो
  • अलग रहने का प्रमाण (यदि हो — rent agreement, utility bills आदि)
  • यदि बच्चे हैं तो उनका Birth Certificate
  • Settlement Agreement
  • Court Fees (न्यायालय शुल्क)

First Motion की सुनवाई: Court दोनों पक्षों को बुलाती है। दोनों अपने बयान देते हैं। Judge यह सुनिश्चित करता है कि:

  • यह petition स्वेच्छा से दी गई है
  • दोनों समझते हैं कि वे क्या कर रहे हैं
  • कोई दबाव या धोखाधड़ी नहीं है

First Motion स्वीकार होने पर “Cooling Off Period” शुरू होता है।


📌 चरण 4: 6 महीने का Cooling Off Period (प्रतीक्षा अवधि)

First Motion के बाद कानून 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि देता है।

इस period का उद्देश्य: यह time दोनों पक्षों को दिया जाता है ताकि वे:

  • अपने निर्णय पर दोबारा विचार कर सकें
  • यदि संभव हो तो सुलह कर सकें
  • बच्चों और परिवार की भलाई पर सोच सकें

यह 6 महीने की maximum limit है, minimum नहीं।

क्या Cooling Off Period माफ हो सकती है?

हाँ। 2017 में Supreme Court of India ने Amardeep Singh vs Harveen Kaur case में ऐतिहासिक फैसला दिया कि:

“6 महीने का cooling off period mandatory नहीं है। Court, case की circumstances देखकर इसे waive कर सकती है।”

Cooling off period waive होने की संभावना तब बढ़ती है जब:

  • दोनों पहले से काफी समय से अलग हों (1.5 साल से ज्यादा)
  • Mediation पहले हो चुकी हो और सुलह असंभव हो
  • Settlement पूरी तरह हो चुकी हो
  • बच्चों का custody settled हो

📌 चरण 5: Second Motion — दूसरा आवेदन

6 महीने (या waiver के बाद) दोनों पक्ष दोबारा Court में हाज़िर होते हैं और Second Motion Petition दाखिल करते हैं।

इसमें दोनों यह confirm करते हैं कि:

  • वे अभी भी तलाक लेना चाहते हैं
  • उनकी सहमति पहले जैसी ही है
  • Settlement Agreement पर वे कायम हैं

Second Motion की समयसीमा: Second Motion, First Motion के 6 महीने बाद से 18 महीने के भीतर दाखिल होना चाहिए। 18 महीने बाद petition खारिज हो सकती है।


📌 चरण 6: तलाक का आदेश (Divorce Decree)

Second Motion के बाद Court दोनों पक्षों का बयान सुनती है और संतुष्ट होने पर Divorce Decree जारी करती है।

यह Decree एक कानूनी दस्तावेज़ है जो यह प्रमाणित करती है कि विवाह कानूनी रूप से समाप्त हो गया है।

इस Decree के बाद:

  • दोनों कानूनी रूप से “single” हो जाते हैं
  • दोनों दूसरी शादी कर सकते हैं (कानूनी रूप से)
  • Settlement Agreement legally enforceable हो जाती है

आपसी सहमति से तलाक में कितना समय लगता है?

यह सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल है।

सामान्य समयसीमा:

स्थितिसमय
Cooling Off Period के साथ6 से 18 महीने
Cooling Off Period waive होने पर3 से 6 महीने
यदि Court में delay हो18 महीने से 2 साल

समय बढ़ने के कारण:

  • Court में case load ज्यादा होना
  • किसी एक पक्ष का hearing में न आना
  • Settlement पर बाद में disagreement
  • Documents में कमी

समय कम होने के कारण:

  • Cooling Off Period का waiver
  • Mediation पहले complete हो
  • सभी Documents ready हों
  • दोनों हर hearing में उपस्थित हों

आपसी सहमति से तलाक में कितना खर्च होता है?

खर्च कई factors पर निर्भर करता है:

Court Fees:

  • Family Court में petition filing fee: ₹500 से ₹2,000 (court और state के अनुसार अलग)

Advocate की फीस:

यह सबसे बड़ा खर्च है और यह निर्भर करता है:

  • वकील के अनुभव पर
  • शहर पर (metro vs tier-2/3 city)
  • Case की complexity पर
शहर / स्तरवकील की अनुमानित फीस
छोटे शहर / जिला कोर्ट₹10,000 – ₹30,000
बड़े शहर (Lucknow, Jaipur, Pune)₹25,000 – ₹75,000
Metro (Delhi, Mumbai, Bangalore)₹50,000 – ₹2,00,000+

Notary / Documentation charges: ₹500 – ₹2,000

Mediation charges (यदि required हो): ₹2,000 – ₹10,000

कुल अनुमानित खर्च: ₹15,000 से ₹2,50,000 (case और शहर पर निर्भर)


गुजारा भत्ता (Alimony / Maintenance) — क्या, कितना, कब तक?

Alimony वह राशि है जो तलाक के बाद एक पक्ष दूसरे को देता है — आमतौर पर financially independent पक्ष, financially dependent पक्ष को।

कितना Alimony मिल सकता है?

कोई fixed formula नहीं है। यह निर्भर करता है:

  • दोनों की आय और संपत्ति पर
  • शादी की अवधि पर
  • बच्चों की custody पर
  • जीवनस्तर पर जो शादी के दौरान था
  • पत्नी की self-earning capacity पर

Alimony के प्रकार:

1. Permanent Alimony (स्थायी गुजारा भत्ता): एकमुश्त (lump sum) राशि जो एक बार दी जाती है। आपसी सहमति के मामलों में यह सबसे आम है।

2. Monthly Maintenance (मासिक भरण-पोषण): हर महीने एक तय राशि। यह तब तक चलती है जब तक दूसरा पक्ष दूसरी शादी न कर ले या financially independent न हो जाए।

क्या पत्नी को ही Alimony मिलती है?

नहीं। कानून gender-neutral है। यदि पति की आर्थिक स्थिति कमज़ोर है और पत्नी कमाती है, तो पति भी alimony का हकदार हो सकता है।

आपसी सहमति में Alimony कैसे तय होती है?

आपसी सहमति के मामले में, दोनों पक्ष मिलकर alimony की राशि और शर्तें तय करते हैं और उसे Settlement Agreement में लिखित रूप देते हैं। Court आमतौर पर इस Agreement को मान लेती है जब तक यह “unconscionable” (बेहद अनुचित) न हो।


बच्चों की Custody — सबसे संवेदनशील मुद्दा

जब बच्चे हों तो तलाक और भी संवेदनशील हो जाता है। भारतीय कानून में बच्चों की custody के दो प्रकार हैं:

Physical Custody (शारीरिक अभिरक्षा):

बच्चा किसके साथ रहेगा।

Legal Custody (कानूनी अभिरक्षा):

बच्चे के बारे में महत्वपूर्ण निर्णय (शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्म) कौन लेगा।

Custody के प्रकार:

  • Sole Custody: बच्चा एक parent के साथ रहता है
  • Joint Custody: दोनों parents मिलकर जिम्मेदारी उठाते हैं
  • Shared Custody: बच्चा दोनों के पास बारी-बारी से रहता है

Court बच्चे की Custody कैसे तय करती है?

कानून का सिद्धांत है — “Child’s Best Interest” (बच्चे का सर्वोत्तम हित)।

Court देखती है:

  • बच्चे की उम्र (छोटे बच्चे आमतौर पर माँ के पास रहते हैं)
  • बच्चे की इच्छा (यदि वह काफी बड़ा हो)
  • किस parent के पास बच्चे की बेहतर देखभाल हो सकती है
  • बच्चे का अब तक का माहौल
  • दोनों parents की financial और emotional stability

आपसी सहमति में Custody:

दोनों पक्ष मिलकर custody arrangement तय करते हैं। Court इस Agreement को तब तक मान लेती है जब तक बच्चे के हित में हो।

Visitation Rights (मिलने का अधिकार): जिस parent के पास custody नहीं है, उसे मिलने का अधिकार (Visitation Rights) मिलता है। इसका schedule भी Settlement Agreement में तय होता है।


संपत्ति का बंटवारा (Property Division)

भारत में हिंदू कानून के तहत, पत्नी को पति की self-acquired property पर तलाक से पहले कोई automatic right नहीं होती। लेकिन Court “just and equitable” settlement के लिए दोनों की financial contributions को देखती है।

क्या बंटता है:

  • शादी के दौरान joint savings और investments
  • घर जो jointly खरीदा हो
  • Matrimonial Home का अधिकार

क्या नहीं बंटता (generally):

  • पति की पैतृक संपत्ति
  • पत्नी का स्त्रीधन (यह पूरी तरह पत्नी का है)

स्त्रीधन:

पत्नी को शादी में मिले गहने, उपहार, पैसे — यह पूरी तरह पत्नी का होता है। पति इस पर कोई दावा नहीं कर सकता।

आपसी सहमति में: दोनों मिलकर संपत्ति का बंटवारा Settlement Agreement में तय करते हैं।


ऑनलाइन / Virtual Hearing से तलाक — क्या संभव है?

COVID के बाद से कई High Courts और Family Courts ने Virtual Hearings की अनुमति दी है। कुछ मामलों में:

  • Video Conferencing के जरिए hearing हो सकती है
  • लेकिन petition filing और final hearing के लिए physical presence की जरूरत पड़ सकती है

यह court और state के नियमों पर निर्भर करता है। अपने वकील से पूछें।


Mediation (मध्यस्थता) — एक जरूरी कदम

कई Family Courts में, petition दाखिल होने के बाद Mediation अनिवार्य है। Mediation में:

  • एक neutral mediator दोनों पक्षों से मिलता है
  • यह देखा जाता है कि क्या सुलह (reconciliation) संभव है
  • यदि नहीं, तो settlement की शर्तें finalize होती हैं

Mediation कई बार बहुत उपयोगी होती है क्योंकि:

  • Court का खर्च और समय बचता है
  • दोनों पक्ष खुद अपनी शर्तें तय करते हैं
  • बच्चों पर कम बुरा असर पड़ता है

जरूरी दस्तावेज़ों की पूरी list (Documents Checklist)

आपसी सहमति से तलाक के लिए ये documents तैयार रखें:

दोनों पक्षों के लिए:

  • ☑ Aadhaar Card (identity proof)
  • ☑ PAN Card
  • ☑ Passport size photographs (4-6 copies each)
  • ☑ Address proof (voter ID, utility bill, passport)

विवाह से संबंधित:

  • ☑ Marriage Certificate
  • ☑ Marriage Invitation Card / Wedding Photos (supporting evidence)
  • ☑ यदि Court Marriage हुई — उसका certificate

अलगाव का प्रमाण:

  • ☑ Rent Agreement (यदि अलग रह रहे हों)
  • ☑ Utility bills अलग-अलग addresses पर

बच्चों से संबंधित (यदि लागू हो):

  • ☑ Birth Certificate of children
  • ☑ School records

Settlement Agreement:

  • ☑ Drafted और notarized settlement agreement

कुछ महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान जो जानने चाहिए

क्या Second Motion से पहले एक पक्ष मन बदल सकता है?

हाँ। अगर First Motion और Second Motion के बीच कोई एक पक्ष तलाक से मना कर दे, तो petition खारिज हो सकती है। Supreme Court ने यह माना है कि Second Motion दाखिल करना दोनों की voluntary consent पर निर्भर है।

क्या Divorce Decree के बाद अपील हो सकती है?

हाँ, लेकिन Mutual Consent Divorce में यह बहुत कम होता है। यदि कोई पक्ष साबित करे कि consent “free” नहीं थी (धमकी, दबाव, fraud), तो High Court में appeal हो सकती है।

दूसरी शादी कब कर सकते हैं?

Divorce Decree मिलने के बाद। लेकिन यदि decree में Appeal Period का उल्लेख हो, तो appeal period खत्म होने के बाद। सामान्यतः Divorce Decree मिलते ही दूसरी शादी legally valid होती है।

NRI के मामले में?

यदि दोनों में से एक या दोनों NRI हैं, तो मामला थोड़ा जटिल हो सकता है। Foreign divorce decree को India में recognize करवाने की अलग प्रक्रिया है। इसके लिए विशेषज्ञ NRI divorce lawyer से मिलें।


Mutual Consent Divorce के फायदे और नुकसान

✅ फायदे:

  • समय कम लगता है — contested divorce की तुलना में बहुत जल्दी होता है
  • खर्च कम होता है — लंबी legal battles नहीं
  • मानसिक शांति — आरोप-प्रत्यारोप नहीं
  • गोपनीयता — details court में कम आती हैं
  • बच्चों को कम नुकसान — friendly separation बच्चों पर कम असर डालती है
  • दोनों की dignity बनी रहती है — किसी को “guilty” नहीं ठहराया जाता

❌ नुकसान / सावधानियां:

  • दोनों की सहमति जरूरी — यदि एक पक्ष मना करे, तो यह process नहीं चलेगी
  • Settlement तय करना कठिन हो सकता है — खासकर संपत्ति और custody पर
  • Cooling Period का इंतजार — 6 महीने की प्रतीक्षा
  • Second Motion से पहले मन बदल सकता है — प्रक्रिया अटक सकती है
  • Legal advice जरूरी — बिना वकील के Settlement Agreement में गलतियाँ हो सकती हैं

तलाक के बाद — आगे का जीवन

तलाक एक अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। कुछ practical बातें:

कानूनी कदम:

  • Bank accounts से joint names हटाएं
  • Nominee बदलें (insurance, PF, bank)
  • Will update करें
  • Aadhaar, PAN में address update करें (यदि बदला हो)
  • Divorce Decree की certified copies रखें

मानसिक स्वास्थ्य:

  • किसी trusted person से बात करें
  • यदि जरूरत हो तो professional counselor से मिलें
  • बच्चों की emotional needs पर ध्यान दें
  • Social support network बनाएं

निष्कर्ष (Conclusion)

आपसी सहमति से तलाक — भारतीय कानून की एक ऐसी व्यवस्था है जो दो लोगों को सम्मान के साथ, बिना किसी दोषारोपण के, अपनी जिंदगी आगे बढ़ाने का मौका देती है।

यह प्रक्रिया लंबी जरूर है — 6 महीने से 1.5 साल — लेकिन Contested Divorce की तुलना में यह बहुत कम दर्दनाक है।

सबसे जरूरी बात — हमेशा एक अनुभवी Family Law Advocate से मिलें। हर case अलग होता है। Settlement Agreement सही तरीके से draft होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई विवाद न हो।

यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी प्रकार की कानूनी सलाह नहीं है। अपनी specific situation के लिए हमेशा qualified advocate से परामर्श लें।


Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1. आपसी सहमति से तलाक में कितना समय लगता है?

Ans: Cooling Off Period के साथ 6 महीने से 18 महीने का समय लग सकता है। यदि Supreme Court के 2017 के फैसले के अनुसार Cooling Off Period waive हो जाए, तो 3 से 6 महीने में भी तलाक संभव है।

Q2. आपसी सहमति से तलाक के लिए कितने साल अलग रहना जरूरी है?

Ans: Hindu Marriage Act Section 13B के तहत कम से कम 1 साल से अलग रहना जरूरी है। इसके अलावा शादी को भी कम से कम 1 साल पुरानी होनी चाहिए।

Q3. क्या बिना वकील के आपसी सहमति से तलाक हो सकता है?

Ans: कानूनी रूप से आप खुद petition दाखिल कर सकते हैं, लेकिन यह बेहद जोखिम भरा है। Settlement Agreement, Custody arrangement और Alimony के मुद्दों पर गलती से भविष्य में बड़ी कानूनी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए अनुभवी Family Law Advocate से मदद लेना जरूरी है।

Q4. Cooling Off Period क्या है और क्या इसे माफ किया जा सकता है?

Ans: First Motion के बाद कानून 6 महीने का “Cooling Off Period” देता है ताकि दोनों पक्ष दोबारा सोच सकें। 2017 में Supreme Court ने माना कि यह mandatory नहीं है — Court circumstances देखकर इसे waive कर सकती है, खासकर जब सुलह की कोई संभावना न हो।

Q5. आपसी सहमति से तलाक में Alimony कितनी मिलती है?

Ans: कोई fixed amount नहीं है। यह दोनों पक्षों की आय, शादी की अवधि, बच्चों की custody और जीवनस्तर पर निर्भर करता है। आपसी सहमति में दोनों मिलकर राशि तय करते हैं। Court इसे Settlement Agreement के रूप में मान लेती है।

Q6. क्या पति भी Alimony माँग सकता है?

Ans: हाँ। भारतीय कानून gender-neutral है। यदि पत्नी की आय पति से अधिक है, तो पति भी maintenance/alimony का हकदार हो सकता है।

Q7. तलाक के बाद बच्चा किसके पास रहेगा?

Ans: यह Court का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय होता है और इसका आधार होता है — “Child’s Best Interest”। आपसी सहमति में दोनों पक्ष custody arrangement खुद तय कर सकते हैं। Court इसे तब तक मान लेती है जब तक बच्चे के हित में हो।

Q8. क्या आपसी सहमति से तलाक के बाद फिर से शादी कर सकते हैं?

Ans: हाँ। Divorce Decree मिलने के बाद दोनों पक्ष कानूनी रूप से दूसरी शादी के लिए free हैं।

Q9. आपसी सहमति से तलाक के लिए किस Court में जाएं?

Ans: अपने जिले की Family Court में। Jurisdiction वहाँ होती है जहाँ शादी हुई थी, जहाँ दोनों last साथ रहे थे, या जहाँ पत्नी अभी रह रही है।

Q10. क्या Muslim Marriage में भी आपसी सहमति से तलाक होता है?

Ans: मुस्लिम पर्सनल लॉ में Mubarat (दोनों की सहमति से विवाह समाप्त करना) का प्रावधान है। यह Hindu Marriage Act की तरह नहीं है — इसके लिए Muslim Personal Law के विशेषज्ञ वकील से मिलें।

Q11. Section 13B और Section 13 में क्या अंतर है?

Ans: Section 13 Hindu Marriage Act का वह प्रावधान है जिसके तहत एकतरफा तलाक (Contested Divorce) लिया जाता है — जिसमें एक पक्ष दूसरे पर क्रूरता, व्यभिचार, परित्याग आदि का आरोप लगाता है। Section 13B आपसी सहमति से तलाक का प्रावधान है — जहाँ कोई आरोप नहीं, केवल सहमति।

Q12. क्या Second Motion से पहले एक पक्ष मना कर सकता है?

Ans: हाँ। अगर Second Motion से पहले कोई एक पक्ष अपनी सहमति वापस ले ले, तो petition खारिज हो जाती है। ऐसे में Contested Divorce का रास्ता ही बचता है।


यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है और इसे कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। अपनी विशिष्ट परिस्थितियों के लिए हमेशा एक योग्य अधिवक्ता (Advocate) से परामर्श लें। कानून समय-समय पर बदलते हैं — नवीनतम जानकारी के लिए अपने वकील से संपर्क करें।